✒️ परवेज अख्तर / एडिटर इन चीफ
सिवान नगर परिषद इन दिनों सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों से जुर्माना वसूल रही है। कागजों में यह कार्रवाई पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी पहल दिखाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सवाल यह है कि क्या केवल छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई कर देने से शहर प्लास्टिक मुक्त हो जाएगा?
शहर के 45 वार्डों में हर दिन निकलने वाले सैकड़ों टन कूड़े में प्लास्टिक कचरे का अंबार लगा हुआ है। सड़क किनारे, नालों के पास और खाली पड़े भूखंडों में खुलेआम प्लास्टिक डंप किया जा रहा है। कई जगह तो स्थायी डंपिंग जोन बन चुके हैं, जहां सैकड़ों किलो प्लास्टिक खुले में सड़ रहा है। इससे पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
विडंबना यह है कि नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी इस बड़े संकट पर आंखें मूंदे हुए हैं। प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट के नाम पर कोई ठोस रणनीति या प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आती। न तो प्लास्टिक कचरे के पृथक्करण की व्यवस्था है और न ही उसके निष्पादन की कोई स्पष्ट योजना। ऐसे में केवल छोटे दुकानदारों के यहां छापेमारी कर जुर्माना वसूलना एकतरफा और दिखावटी कार्रवाई ही प्रतीत होती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहर में जो बड़े स्तर पर प्लास्टिक कचरे की अवैध डंपिंग हो रही है, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या नियम सिर्फ छोटे व्यापारियों और आम लोगों के लिए हैं? क्या बड़े स्तर पर कचरा फैलाने वालों को संरक्षण प्राप्त है? यदि नगर परिषद वास्तव में प्लास्टिक मुक्त शहर बनाना चाहती है तो उसे पहले खुद की व्यवस्था सुधारनी होगी।
प्रशासन को चाहिए कि वह शहर में प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की व्यवस्था करे, अवैध डंपिंग स्थलों को चिन्हित कर सख्त कार्रवाई करे और जनजागरूकता अभियान चलाए। केवल जुर्माना वसूलने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक प्लास्टिक कचरे के स्रोत से लेकर उसके निस्तारण तक की ठोस व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक यह अभियान महज खानापूर्ति और प्रचार का माध्यम बनकर रह जाएगा।
आज जरूरत दिखावटी कार्रवाई की नहीं, बल्कि ईमानदार और व्यापक पहल की है। वरना प्लास्टिक के खिलाफ चल रही यह मुहिम जनता की नजरों में सिर्फ “चुनिंदा कार्रवाई” बनकर रह जाएगी।

