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March 15, 2026 3:05 am

माहे रमजान की रातों को नूरानी रात कहा जाता है, जो रूहानी सुकून लाती है : हाफिज अशरफ रशीदी

✒️ परवेज अख्तर / एडिटर इन चीफ

कुरान-ए-पाक को समझना और उसकी तिलावत करना रूह को सुकून व सवाब पहुंचाने वाला होता है

• रमजान का आखिरी अशरा चल रहा है, जिसमें इबादत का विशेष महत्व है
• रमजान की विषम रातों में शब-ए-कद्र की तलाश करने की हिदायत
• 27वीं रात को शब-ए-कद्र के रूप में अधिक अहम माना जाता है
• गरीबों को ईद की खुशियों में शामिल करने के लिए ज़कात और फितरा अदा करना जरूरी

सिवान : शहर के एमएम कॉलोनी के नजदीक अमजदिया कॉलोनी स्थित मदरसा अल जमीअतुल अमजदिया के प्रधानाचार्य हाफिज व मौलाना अशरफ रशीदी ने रमजानुल मुबारक की फजीलत बयान करते हुए कहा कि माहे रमजान का आखिरी अशरा चल रहा है। उन्होंने कहा कि रमजान के आखिरी दस दिनों में शब-ए-कद्र की रातें आती हैं। रमजान की 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रातों को शब-ए-कद्र की रात कहा जाता है, जिसमें जागकर अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। हालांकि 27वीं रात पर अधिक जोर दिया जाता है और इसे तकदीर बदलने वाली रात माना जाता है।
उन्होंने कहा कि यह अपने गुनाहों की माफी मांगने का सबसे बेहतरीन समय होता है। रो-रोकर खुदा से गिड़गिड़ाना और माफी मांगना किस्मत के बंद दरवाजों को भी खोल सकता है। रमजान के पूरे महीने कुरान की तिलावत की जाती है, लेकिन आखिरी दस दिनों में कुरान-ए-पाक को समझना और उसकी तिलावत करना रूह को सुकून और सवाब पहुंचाने वाला होता है।
मौलाना अशरफ रशीदी ने कहा कि ईद की खुशियों में गरीबों को शामिल करने के लिए ज़कात और फितरा अदा करना वाजिब है, ताकि कोई भी भूखा न रहे। अगर यह नेक काम रमजान के आखिरी दिनों में किया जाए तो इसका सवाब कई गुना बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि ज़कात देना महज़ दान नहीं, बल्कि इबादत है। यह हमारा पवित्र कर्तव्य और जिम्मेदारी है, जिसके माध्यम से हम अल्लाह द्वारा दिए गए अधिकार को पूरा करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस पवित्र महीने के दौरान ज़कात का महत्व और बढ़ जाता है। लोगों के सहयोग से जरूरतमंद समुदायों के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है और उनकी परेशानियों को कम किया जा सकता है।

Samay Siwan
Author: Samay Siwan

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