✒️ परवेज अख्तर / एडिटर इन चीफ
पड़ौली गांव की नूरी मस्जिद में रमजान की फजीलत बयान, एतिकाफ की अहमियत पर डाला प्रकाश
• रमजान के तीसरे अशरे की शुरुआत के साथ एतिकाफ की इबादत शुरू
• मस्जिद में रहकर इबादत करने को एतिकाफ कहा जाता है
• आखिरी दस दिनों में शब-ए-कद्र मिलने की भी उम्मीद
• एतिकाफ करने पर दो हज और दो उमराह के बराबर सवाब मिलने की हदीस
लकड़ी नबीगंज (सिवान): प्रखंड के पड़ौली गांव स्थित नूरी मस्जिद के हाफिज जमील अहमद ने माहे रमजानुल मुबारक की फजीलत बयान करते हुए कहा कि रमजान के आखिरी अशरे की शुरुआत होते ही मुस्लिम समुदाय में एतिकाफ की खास अहमियत बढ़ जाती है। एतिकाफ का अर्थ है मस्जिद में रहकर पूरी तरह अल्लाह की इबादत में समय बिताना।
उन्होंने बताया कि एतिकाफ रमजान के अंतिम दस दिनों में किया जाता है और इसे सुन्नत-ए-मुअक्कदा माना जाता है, यानी ऐसी सुन्नत जिसे पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने नियमित रूप से निभाया। एतिकाफ करने वाले लोग दुनियावी कामों से दूर रहकर नमाज, कुरान की तिलावत और दुआ में अपना समय बिताते हैं।
हाफिज जमील अहमद ने कहा कि पवित्र रमजान का महीना अब अपने अंतिम चरण यानी तीसरे अशरे में प्रवेश कर चुका है। इस दौरान सबसे महत्वपूर्ण इबादत एतिकाफ शुरू हो गई है, जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय में खासा उत्साह और संजीदगी देखी जा रही है।
उन्होंने कहा कि एतिकाफ का मतलब है दुनियावी कामों को छोड़कर इबादत की नीयत से मस्जिद के भीतर एक निश्चित समय तक ठहरना। हदीस के अनुसार रसूल-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है कि जिसने रमजान के आखिरी दस दिनों का एतिकाफ किया, उसे दो हज और दो उमराह के बराबर सवाब मिलता है।
एक अन्य हदीस का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि हजरत आयशा सिद्दीका (रजीअल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि हुजूर (सल्ल.) रमजान के आखिरी दस दिनों में नियमित रूप से एतिकाफ फरमाते थे।
उन्होंने कहा कि माहे रमजान का आखिरी अशरा जहन्नुम की आग से निजात का होता है। इस अशरे की बड़ी अहमियत है, क्योंकि अल्लाह तआला इस दौरान बंदों के गुनाह माफ कर उन्हें जहन्नुम से निजात अता करता है।

