सिवान: जनवादी लेखक संघ का 45वां स्थापना दिवस मनाया गया
✒️ परवेज अख्तर / एडिटर इन चीफ
कन्हैयालाल केंद्रीय जिला पुस्तकालय में आयोजन, कवि सम्मेलन व मुशायरे से गूंजा सभागार
सिवान शहर स्थित कन्हैयालाल केंद्रीय जिला पुस्तकालय में सोमवार को जनवादी लेखक संघ (जलेस) का 45वां स्थापना दिवस वरिष्ठ शायर कमर सीवानी की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जिले के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की शुरुआत जलेस के कोषाध्यक्ष डॉ. के. एहतेशाम ने आगंतुक सदस्यों के स्वागत से की। उन्होंने अपनी रचना— “कई सालों में अपनी जिंदगी बस इतनी बदली है, / है हर पर थोड़ी चांदी, शक्ल पर थोड़ी झुर्री है, / बहुत सिद्दत से वह सब दिन पुरानी याद आती है, / जमाने जितने गुजरे हैं, जमाने याद आते हैं”— प्रस्तुत कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।
जलेस सचिव मार्कण्डेय ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि जनवादी लेखक संघ हिंदी-उर्दू लेखकों का ऐसा संगठन है, जो जनवाद के विरुद्ध हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ निरंतर आवाज़ उठाता रहा है। उन्होंने कहा कि संगठन साम्राज्यवाद और फासीवाद का विरोधी तथा मानवता का पक्षधर है।
कार्यकारी सचिव अरुण कुमार सिंह ने जलेस की स्थापना की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जब प्रगतिशील लेखक संघ सत्ता-लोभी होकर जनवादी मूल्यों से दूर हो गया, तब जनपक्षीय रचनाकारों ने 13-14 फरवरी 1928 को दिल्ली में जनवादी लेखक संघ की स्थापना की। उन्होंने संगठन की वैचारिक प्रतिबद्धता और उसके ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता रविंद्र सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जनवाद पर विभिन्न प्रकार के हमले हो रहे हैं। राजनीतिक हिंदू और सनातनी हिंदू की बहस ने सामाजिक विमर्श को नई दिशा दी है। ऐसे दौर में लेखकों और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे समाज को सही दिशा दें।
समारोह के दूसरे चरण में कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन हुआ। विक्रमा पंडित विवेकी की पंक्तियां— “बंधन प्रेम सदा जो तोड़े, या आपस में नाता तोड़े”— को श्रोताओं ने खूब सराहा। लाइची हरिराही की रचना “नहीं मिलेगा, भूखों का चीत्कार चाहे तुम सीने को छलनी कर दो” भी विशेष रूप से पसंद की गई। अधिवक्ता अरशद अली ने अपनी रचना “नफरत की आग बुझा क्यों नहीं देते” के माध्यम से सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया।
अध्यक्ष कमर सीवानी ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से समारोह में नई ऊर्जा भर दी। उनकी पंक्तियां—
“ना इस पर रूस लिखा है, ना तुर्किस्तान, ना पाकिस्तान,
वतन वालों देख लो, इस दिल पर हिंदुस्तान लिखा है।”
ने सभागार में देशभक्ति और एकता का माहौल बना दिया।
उन्होंने आगे कहा कि जलेस सच्चाई का नगीना है, जो डगमगाते कदमों को संभाल लेता है और पहाड़ काटकर रास्ता निकालने की ताकत रखता है।
कार्यक्रम में प्रमुख वक्ताओं के रूप में युगल किशोर दूबे, डॉ. इलतेफात आमजदी, शिक्षक उपेंद्र कुमार यादव, डॉ. जगन्नाथ प्रसाद, हैदर वारसी, परमा चौधरी, नीरज यादव और शशि कुमार सहित अन्य साहित्यकार उपस्थित रहे।