✍परवेज़ अख़्तर/एडिटर इन चीफ
एड्स जैसी लाइलाज बीमारी से बचाव के लिए जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन सफलता सीमित है। जिले में एचआईवी पॉजिटिव मरीजों की संख्या हर साल बढ़ रही है। बीते एक वर्ष में 17 एड्स पीड़ितों की मौत हो चुकी है, जबकि 3,596 मरीजों का इलाज एआरटी सेंटर में चल रहा है। इनमें 470 नए मरीज शामिल हैं, 53 एचआईवी प्लस टीवी पॉजिटिव मरीज हैं और 22 गर्भवती महिलाएं भी एड्स से पीड़ित हैं। यह बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में तेजी से फैल रही है।
सरकारी योजनाओं का लाभ:
एचआईवी मरीजों को ₹1,500 प्रति माह:
बिहार शताब्दी एड्स पीड़ित कल्याण योजना के तहत जिले के 2,800 एचआईवी मरीजों को प्रति माह ₹1,500 दिए जा रहे हैं, जिससे वे अपने पोषण और देखभाल का प्रबंध कर सकें।
परवरिश योजना:
एचआईवी पीड़ितों के 600 बच्चों को परवरिश योजना के तहत प्रति माह ₹1,000 की सहायता राशि दी जा रही है। यह सहायता 0 से 18 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए एआरटी सेंटर के माध्यम से प्रदान की जाती है।
नियमित दवा और जांच का महत्व:
एचआईवी एड्स मरीजों की नियमित दवा और जांच अनिवार्य है। एचआईवी की दवाएं केवल एआरटी सेंटर पर उपलब्ध हैं, इसलिए मरीजों को समय पर दवा लेने सेंटर आना पड़ता है।
अधिकारियों का बयान:
डॉ. अनिल कुमार सिंह, जिला एड्स नियंत्रण पदाधिकारी, ने कहा कि एड्स मरीजों को आवश्यक दवाएं और जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। साथ ही योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता दी जाती है। उन्होंने बताया कि जागरूकता के बावजूद लापरवाही के कारण मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इसके लिए जागरूकता अभियान नियमित रूप से चलाए जाते हैं।

