✒️ मक़बूल आलम
ज्ञान, करुणा और सांप्रदायिक सौहार्द के आलोक स्तंभ: सूर्यनारायण पाठक की अमर जीवनगाथा
- शिक्षा और इंसानियत के जरिए हजारों जीवन को दी दिशा
- 11 अप्रैल 2026 को हुआ निधन, 22 अप्रैल को श्राद्ध कर्म संपन्न
- शेख मुहल्ला में रहकर शिक्षा और एकता की मिसाल कायम की
- हजारों छात्रों को पढ़ाई के लिए प्रेरित कर समाज को दी नई दिशा
- 1984 दंगों में सिख समुदाय की मदद कर पेश की इंसानियत की मिसाल
सिवान की पावन धरती पर जब भी शिक्षा, संस्कार और सामाजिक समरसता की बात होगी, एक नाम स्वतः ही स्मृतियों के आकाश में उजाले की तरह चमकेगा—स्वर्गीय सूर्यनारायण पाठक।
11 अप्रैल 2026 को उनके देहावसान ने केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक विचार, एक परंपरा और एक जीवंत प्रेरणा को शारीरिक रूप से हमसे दूर कर दिया। किंतु ऐसे व्यक्तित्व कभी वास्तव में विदा नहीं होते; वे अपने कर्मों, अपने संस्कारों और अपने द्वारा प्रज्ज्वलित दीपों में जीवित रहते हैं।

6 वर्ष की नन्ही उम्र में उठ गया था पिता का साया
जीवन की कहानी अक्सर वहीं से शुरू होती है, जहाँ सबसे अधिक अभाव होता है। सूर्यनारायण पाठक की जीवन-यात्रा भी एक गहरे शून्य से प्रारंभ हुई। मात्र छह वर्ष की कोमल आयु में पिता वैधनाथ पाठक का साया उनके सिर से उठ गया। वैधनाथ पाठक, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित शिक्षक और इस्लामिया हाई स्कूल के संस्थापक सदस्यों में से थे, अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए थे, जिसे संभालना एक छोटे से बालक के लिए अत्यंत कठिन था।
किन्तु शायद यही नियति थी—विपरीत परिस्थितियाँ ही उनके भीतर एक असाधारण धैर्य, अनुशासन और संकल्प का बीज बो गईं। पिता के अभाव ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि गढ़ा। उन्होंने अभावों की धूप में तपकर अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाया कि वे स्वयं एक छाया बन सके—उन हजारों बच्चों के लिए, जिन्हें जीवन में मार्गदर्शन की आवश्यकता थी।

सादगी में छिपी विराटता
सूर्यनारायण पाठक का व्यक्तित्व किसी ऊँचे पर्वत की तरह था—दूर से साधारण दिखने वाला, किन्तु निकट जाने पर उसकी ऊँचाई और गहराई का अनुमान होता है। वे कम बोलते थे, परंतु उनके शब्दों में अनुभव की गहराई और भविष्य की दृष्टि समाई होती थी। वे एक अद्भुत श्रोता थे—लोगों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनते, समझते और फिर एक ऐसी सलाह देते, जो सीधे हृदय में उतर जाती।
उनका जीवन किसी आडंबर से रहित था। सादा वस्त्र, सहज व्यवहार और विनम्र मुस्कान—यही उनकी पहचान थी। किंतु इसी सादगी के भीतर एक विराट व्यक्तित्व छिपा था, जिसने अनगिनत जीवनों को दिशा दी।

शेख मुहल्ला: एक घर, जो पूरा समाज था
सिवान के शेख मुहल्ला, हाफिज जी चौक के पास स्थित उनका निवास केवल एक घर नहीं था, वह एक जीवंत संस्थान था। मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका रहना और वहां के लोगों के साथ उनका आत्मीय संबंध इस बात का प्रमाण था कि मानवता किसी धर्म या जाति की मोहताज नहीं होती।
उनका दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था—चाहे वह एक छात्र हो, एक अभिभावक, एक पड़ोसी या कोई राहगीर। वहां बैठकर चाय की चुस्कियों के बीच होने वाली चर्चाएं केवल सामान्य बातचीत नहीं होती थीं; वे जीवन के दर्शन, शिक्षा के महत्व और इंसानियत के मूल्यों की पाठशाला होती थीं।

शिक्षा: उनका धर्म, उनका कर्म
यदि सूर्यनारायण पाठक के जीवन को एक शब्द में परिभाषित करना हो, तो वह शब्द होगा—“शिक्षा”। वे केवल एक शिक्षक नहीं थे, वे शिक्षा के पुजारी थे। डीएवी हाई स्कूल, सिवान में अंग्रेजी और अर्थशास्त्र के शिक्षक के रूप में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं, और बाद में प्रभारी प्रधानाचार्य के पद को भी सुशोभित किया। अंततः 2005 में दरौंदा के उच्च विद्यालय से प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
किन्तु उनकी शिक्षकीय भूमिका स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं थी। वे 24 घंटे शिक्षक थे। यह उस दौर की बात है, जब शिक्षा का स्तर कमजोर था और अभिभावकों में जागरूकता की कमी थी। शेख मोहल्ला की गलियों में कंचे और लट्टू खेलते बच्चों के बीच वे स्नेह से पहुंचते और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करते।
वे हर बच्चे में संभावना तलाशते। जो बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके होते, उनके अभिभावकों से वे दृढ़ता से कहते—“ बच्चा के कम से कम मैट्रिक तक जरूर पढ़ाईं, आगे चलके बहुत काम आयी” वहीं बच्चों से वे सहज शब्दों में कहते—“बबुआ पढ़ाई से ही तू लोग के भविष्य बनी,पढ़ा लोग”

एक समर्पित शिक्षक के रूप में वे चौबीसों घंटे अपने कर्तव्य में लगे रहते थे। उनकी प्रेरणा से उस समय, जब मैट्रिक एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, हजारों युवाओं ने पढ़ाई जारी रखी और आगे बढ़े। आज उनके अनेक शिष्य ऊंचे पदों पर हैं, जो उनके समर्पण की जीवंत मिसाल हैं।

एक युग का निर्माण
वह समय, जब शिक्षा को लेकर समाज में जागरूकता का अभाव था, जब शेख मुहल्ला जैसे इलाकों को शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा माना जाता था—ऐसे समय में सूर्यनारायण पाठक ने ज्ञान की एक ऐसी लौ जलाई, जिसने पूरे क्षेत्र को प्रकाशित कर दिया।
स्वर्गीय पाठक जी के पड़ोसी डॉ. ख्वाजा एहतेशाम स्मरण करते हुए बताते हैं कि उनके दरवाजे पर सैकड़ों छात्रों की भीड़ रहती थी। वे वहां केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखने आते थे।
उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि उस दौर में, जब मैट्रिक पास करना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, हजारों छात्रों ने यह मुकाम हासिल किया। आज उनके शिष्य देश-विदेश में उच्च पदों पर कार्यरत हैं—और यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

भाषा और संस्कृति के सेतु
सूर्यनारायण पाठक का व्यक्तित्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था; वे संस्कृति और भाषा के भी संवाहक थे। उन्होंने उर्दू में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की थी और इस भाषा के गहरे जानकार थे।
सर्दियों की नर्म धूप में बैठकर उर्दू अखबार पढ़ते हुए उनका दृश्य केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक था, जो सिवान की मिट्टी में रची-बसी है।
इंसानियत की मिसाल: 1984 के दंगे
1984 का वह भयावह समय, जब देश दंगों की आग में झुलस रहा था—उस दौर में सूर्यनारायण पाठक ने बिहार होमगार्ड के जवान के रूप में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने न केवल अपनी ड्यूटी निभाई, बल्कि कई सिखों की मदद कर इंसानियत का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
यह उनके जीवन का वह अध्याय है, जो यह सिद्ध करता है कि वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक सच्चे इंसान थे—जो हर परिस्थिति में मानवता को सर्वोपरि मानते थे।

परिवार: संस्कारों की पाठशाला
एक महान शिक्षक के साथ-साथ वे एक आदर्श पिता भी थे। तीन पुत्र और पांच पुत्रियों के पिता होने के बावजूद उन्होंने कभी बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं किया। उन्होंने अपनी बेटियों को भी उतनी ही शिक्षा और अवसर दिए, जितने अपने बेटों को।
आज उनकी पांचों बेटियां शिक्षिका और प्रोफेसर के रूप में समाज को शिक्षित कर रही हैं। उनके मंझले पुत्र डॉ. तरुण पाठक डीएवी हाई स्कूल के प्रधानाचार्य हैं, जबकि छोटे पुत्र वरुण पाठक एक शिक्षक हैं।
उनके सबसे बड़े पुत्र डॉ. अरुण पाठक का यह संकल्प कि वे अपने पिता के पदचिन्हों पर चलेंगे, यह दर्शाता है कि पाठक जी ने अपने बच्चों को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के उच्चतम मूल्य भी दिए।

मित्रता और मानवीय रिश्ते
सूर्यनारायण पाठक के जीवन का एक और सुंदर पहलू था—उनकी मित्रता। वे ऐसे व्यक्ति थे, जिनके मित्र उन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते थे।
राजेंद्र प्रसाद जैसे उनके करीबी मित्र बताते हैं कि पाठक जी के बिना उनका जीवन अधूरा था। वे कभी किसी को नाराज नहीं रहने देते थे और हर रिश्ते को पूरे दिल से निभाते थे।
मुन्ना शर्मा, अमरपाली होटल के मालिक, बताते हैं कि पाठक जी के साथ बिताए गए पल आज भी उनके लिए अनमोल हैं—जहां चाय की चुस्कियों के बीच जीवन के गहरे विषयों पर चर्चा होती थी।

एक युग का अवसान
11 अप्रैल 2026 को जब सूर्यनारायण पाठक ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो सिवान के शेख मुहल्ला में जैसे समय ठहर गया। उनके दरवाजे पर, जहां कभी ज्ञान की बातें होती थीं, वहां अब उनकी स्मृतियों की गूंज थी।
22 अप्रैल को आयोजित उनके श्राद्ध कर्म में सैकड़ों लोग उमड़े—उनके शिष्य, उनके मित्र, उनके पड़ोसी—हर कोई उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने आया। यह केवल एक संस्कार नहीं था, यह उस प्रेम और सम्मान का प्रतीक था, जो उन्होंने अपने जीवन में अर्जित किया था।
एडवोकेट मोहम्मद कलीमुल्लाह की आंखों में आंसू थे, जब वे कह रहे थे कि “आज जो कुछ भी हूं, उसमें पाठक जी का योगदान है।” वहीं, इंतखाब अहमद ने उन्हें एक दुर्लभ व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि “ऐसे लोग दुनियां में बहुत कम ही होते है।

सूर्यनारायण पाठक का जीवन हमें यह सिखाता है कि महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उन दिलों में होती है, जिन्हें आप छूते हैं। उन्होंने हजारों जीवनों को छुआ, उन्हें संवारा और उन्हें एक नई दिशा दी।
उनकी स्मृतियां केवल अतीत की कहानी नहीं हैं, वे वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की दिशा हैं।
उनकी आत्मा अमर है—उनके विचारों में, उनके संस्कारों में और उन अनगिनत दीपों में, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन से प्रज्ज्वलित किया।
सचमुच, सूर्यनारायण पाठक एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे—और ऐसे युग कभी समाप्त नहीं होते, वे इतिहास बनकर सदैव जीवित रहते हैं।

