यूजीसी एक्ट पर रोक नहीं, सामाजिक न्याय की उम्मीद: सुप्रीम कोर्ट से न्यायपूर्ण फैसले की अपेक्षा
✒️ अरुण गुप्ता / पूर्व प्रत्याशी, बड़हरिया विधानसभा (सिवान)
समान अवसर की लड़ाई अदालत से समाज तक
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत और न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लाए गए नए इक्विटी नियम आज राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुके हैं। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, धर्म, लिंग और सामाजिक आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना तथा हर छात्र को समान अवसर देना है।
लेकिन वर्तमान में इन नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने अंतरिम रोक (स्टे) लगा रखी है। इस मामले की अगली सुनवाई मार्च में निर्धारित है। ऐसे में पूरे देश की नजर अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हुई है।
मैं, अरुण गुप्ता, इस मुद्दे को सिर्फ नीति या कानून के नजरिए से नहीं देखता, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों से देखता हूं। मैं अति पिछड़े तेली समाज से आता हूं। बचपन में मैंने खुद सामंती मानसिकता का भेदभाव झेला है। स्कूलों में उपेक्षा, सामाजिक दूरी और अवसरों की कमी क्या होती है, यह मैंने करीब से महसूस किया है।
इसलिए जब यूजीसी जैसे संस्थान भेदभाव खत्म करने की बात करते हैं, तो यह मेरे जैसे लाखों परिवारों के लिए उम्मीद बन जाता है।
यूजीसी के नए नियमों का मकसद स्पष्ट है:
• कैंपस में भेदभाव रोकना
• शिकायत निवारण तंत्र बनाना
• कमजोर और वंचित छात्रों को सुरक्षा देना
• शिक्षा में बराबरी सुनिश्चित करना
फिर भी कुछ वर्ग इसे अनावश्यक या दखलकारी बता रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि अगर व्यवस्था से समानता आती है, तो उसे बोझ नहीं बल्कि सुधार कहा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया स्टे एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, और हमें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। मुझे उम्मीद है कि मार्च में होने वाली सुनवाई में ऐसा फैसला आएगा जो देश के गरीब, दलित, पिछड़े और ग्रामीण छात्रों के हितों की रक्षा करेगा।
क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है, जब माहौल सुरक्षित और भेदभावमुक्त हो।
सिवान और बिहार जैसे क्षेत्रों में हजारों बच्चे पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। उनके सपने यूजीसी की छात्रवृत्ति, सहायता योजनाओं और पारदर्शी नियमों पर टिके हैं। यदि ये संस्थागत सुरक्षा कमजोर हुई, तो सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं बच्चों को होगा।
मेरा स्पष्ट संदेश है —
यूजीसी को मजबूत करना ही सामाजिक न्याय को मजबूत करना है।
और मुझे भरोसा है कि देश की सर्वोच्च अदालत भी इसी भावना के साथ निर्णय देगी।
क्योंकि बराबरी वाली शिक्षा ही सशक्त भारत की असली नींव है।