✒️ परवेज अख्तर / एडिटर इन चीफ
रमजान के आखिरी अशरे में इबादत और खैरात की अहमियत पर दिया जोर
- शब-ए-कद्र की रात हजार महीनों से बेहतर बताई
- रमजान के आखिरी अशरे को जहन्नुम से निजात का समय बताया
- फितरा और जकात अदा करने पर विशेष जोर
- कुरान की तिलावत और समझने की अपील
बड़हरिया (सिवान): जिले के बड़हरिया प्रखंड के बालापुर गांव के मौलाना सैयद हुसैन ने माहे रमजानुल मुबारक की फजीलत बयान करते हुए कहा कि शब-ए-कद्र 21, 23, 25, 27 या 29वीं रात में से कोई एक हो सकती है। इस रात में की गई इबादत हजार महीनों की इबादत के बराबर होती है।
उन्होंने कहा कि यह वक्त अपने गुनाहों से तौबा करने और अल्लाह की रहमत हासिल करने का सबसे बेहतरीन मौका है। रमजान का तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से निजात का समय माना जाता है, इसलिए मुसलमानों को इस दौरान नेक आमाल कर अधिक से अधिक सवाब हासिल करना चाहिए।
मौलाना सैयद हुसैन ने कहा कि रमजान के पूरे महीने कुरान की तिलावत करनी चाहिए, लेकिन आखिरी दस दिनों में कुरान-ए-पाक को समझकर पढ़ना रूह को सुकून देने वाला होता है।
उन्होंने आगे कहा कि ईद की खुशियों में गरीबों को शामिल करने के लिए जकात और फितरा अदा करना जरूरी है, ताकि कोई भी भूखा न रहे। रमजान के आखिरी दिनों में इन नेक कामों का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सदका-ए-फितर हर साहिबे-निसाब मुसलमान पर ईद-उल-फितर से पहले वाजिब है, जबकि जकात मालदार मुसलमानों पर साल के अंत में फर्ज होती है। फितरा परिवार के हर सदस्य की ओर से दिया जाता है, जबकि जकात संपत्ति के 2.5 प्रतिशत हिस्से को गरीबों में बांटने का नाम है।

