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March 1, 2026 9:45 am

तरवारा : पवित्र माहे रमजान को अल्लाह की ओर से तीन अशरों में बांटा गया: मौलाना अहमद शर्फी

✍🏽 परवेज़ अख़्तर/एडिटर इन चीफ

सीवान। तरवारा पंचायत के काजी टोला गांव स्थित काजी मस्जिद के खतीबो इमाम मौलाना अहमद शर्फी ने माहे रमजानुल मुबारक की फजीलत बयान करते हुए कहा कि इस पाक महीने में मुसलमान पूरे माह रोजा रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं। मान्यता है कि रमजान के दौरान रोजा रखने से अल्लाह से गहरा जुड़ाव होता है और नेकी के कामों का 70 गुना अधिक सवाब मिलता है।

मौलाना अहमद शर्फी ने बताया कि रमजान का यह पवित्र महीना अल्लाह की ओर से तीन अशरों में विभाजित किया गया है। 10-10 दिनों के रोजे को अशरा कहा जाता है, जो अरबी शब्द ‘अशरा’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ‘दस’

  • पहला अशरा (रहमत/बरकत): रमजान की शुरुआत से लेकर 10वें रोजे तक का समय रहमत का अशरा कहलाता है।
  • दूसरा अशरा (मगफिरत): 11वें से 20वें रोजे तक का समय मगफिरत यानी गुनाहों की माफी के लिए होता है।
  • तीसरा अशरा (दोजख से निजात): 21वें से अंतिम रोजे तक का समय जहन्नम से आजादी के लिए माना जाता है।

बरकत का अशरा क्या होता है?

मौलाना अहमद शर्फी ने बताया कि माहे रमजान के पहले 10 दिनों को रहमत या बरकत का अशरा कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान रोजा रखने और नमाज अदा करने से अल्लाह की विशेष रहमत प्राप्त होती है। रोजेदारों को इस दौरान अधिक से अधिक नेकी के काम करने की सलाह दी जाती है, जैसे गरीबों को दान देना, जरूरतमंदों की मदद करना और अल्लाह की इबादत में समय बिताना।

Samay Siwan
Author: Samay Siwan

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